केवल यीशु मसीह के द्वारा उद्धार
केवल यीशु मसीह के द्वारा उद्धार
केवल यीशु मसीह के द्वारा उद्धार
“और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं।” — प्रेरितों के काम 4:12
मुख्य वचन — प्रेरितों के काम 4:12
“और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें।”
भूमिका — आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रिय मित्रों, आज मैं आपसे एक ऐसा प्रश्न पूछना चाहता हूँ जो आपके धन, शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय, परिवार, सफलता और शारीरिक स्वास्थ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण है।
आप अनन्तकाल कहाँ बिताएँगे?
एक दिन हम सभी को इस संसार को छोड़ना है।
जीवन में हम बहुत-सी चीज़ों को टाल सकते हैं।
हम घर खरीदने का निर्णय टाल सकते हैं।
हम यात्रा टाल सकते हैं।
हम व्यापार का निर्णय टाल सकते हैं।
हम अनेक जिम्मेदारियों को कुछ समय के लिए टाल सकते हैं।
लेकिन— हम मृत्यु को हमेशा के लिए नहीं टाल सकते।
बाइबल कहती है:- “और जैसे मनुष्यों के लिये एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है।” — इब्रानियों 9:27
इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है:- “मैं इस जीवन में सफल कैसे हो सकता हूँ?”
बल्कि इससे भी बड़ा प्रश्न है:- “मैं पवित्र परमेश्वर के साथ सही संबंध में कैसे आ सकता हूँ और अनन्त जीवन कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?”
और बाइबल इसका स्पष्ट उत्तर देती है: – उद्धार केवल यीशु मसीह के द्वारा है।
हमारी अच्छाई के द्वारा नहीं।
हमारे धार्मिक कार्यों के द्वारा नहीं।
धन के द्वारा नहीं।
केवल अच्छे कामों के द्वारा नहीं।
मानवीय ज्ञान या दर्शन के द्वारा नहीं।
अपनी धार्मिकता के द्वारा नहीं।
उद्धार यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का अनुग्रहपूर्ण वरदान है।
- हमें उद्धार की आवश्यकता क्यों है?
उद्धार को समझने से पहले हमें अपनी समस्या को समझना होगा।
उस समस्या का नाम है:
पाप।
बाइबल कहती है:
“इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।” — रोमियों 3:23
ध्यान दीजिए:
“सब ने पाप किया है।”
कुछ लोगों ने नहीं।
केवल बुरे लोगों ने नहीं।
बल्कि— सब ने पाप किया है।
आप कह सकते हैं:- “मैं कोई बुरा व्यक्ति नहीं हूँ।”
हो सकता है कि आप मानव दृष्टि से एक अच्छे व्यक्ति हों।
आप गरीबों की सहायता करते हों।
आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हों।
आप ईमानदार हों।
आप दूसरों की सहायता करते हों।
आप एक सम्मानित जीवन जीते हों।
लेकिन प्रश्न यह नहीं है:
“क्या मैं किसी दूसरे व्यक्ति से अच्छा हूँ?”
प्रश्न यह है:- “क्या मैं पवित्र परमेश्वर के सामने पूर्ण रूप से धर्मी हूँ?”
परमेश्वर का स्तर पवित्रता है।
पाप हमें परमेश्वर से अलग करता है।
यशायाह 59:2 कहता है:
“तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम्हारे परमेश्वर को तुम से अलग कर दिया है।”
पाप केवल किसी धार्मिक नियम को तोड़ना नहीं है।
पाप हमारे सृष्टिकर्ता परमेश्वर के साथ हमारे संबंध को तोड़ देता है।
- पाप का परिणाम है
बाइबल पाप की गंभीरता को छिपाती नहीं है।
रोमियों 6:23 कहता है:- “क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है।”
इस वचन में दो बातें हैं:
पाप की मजदूरी — मृत्यु।
और
परमेश्वर का वरदान — अनन्त जीवन।
“मजदूरी” शब्द पर ध्यान दीजिए।
जब हम काम करते हैं, तो हमें मजदूरी मिलती है।
उसी प्रकार पाप भी अपना परिणाम उत्पन्न करता है।
लेकिन इस वचन में एक अद्भुत बात है।
परमेश्वर हमें केवल बुरी खबर नहीं देता।
वह हमें सुसमाचार देता है।
“परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है।”
परमेश्वर ने हमारे लिए बचने का मार्ग बनाया है।
और वह मार्ग है—
यीशु मसीह।
- परमेश्वर पापी से प्रेम करता है
शायद कोई व्यक्ति सोच रहा होगा:
“यदि परमेश्वर पाप से घृणा करता है, तो मैं उसके पास क्यों जाऊँ?”
ध्यान से सुनिए।
परमेश्वर पाप से घृणा करता है—
लेकिन परमेश्वर पापी से प्रेम करता है।
बाइबल का सबसे प्रसिद्ध वचन कहता है:- “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।” — यूहन्ना 3:16
ध्यान दीजिए:
परमेश्वर ने प्रेम किया।
परमेश्वर ने दिया।
यीशु संसार में आया।
हम विश्वास करते हैं।
हम अनन्त जीवन प्राप्त करते हैं।
परमेश्वर ने हमारे पूर्ण होने की प्रतीक्षा करके हमसे प्रेम नहीं किया।
रोमियों 5:8 कहता है:- “परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।”
क्रूस परमेश्वर के प्रेम का प्रमाण है।
यीशु इसलिए नहीं मरा कि हम अच्छे थे।
यीशु इसलिए मरा क्योंकि—
हमें उद्धारकर्ता की आवश्यकता थी।
- हम स्वयं को क्यों नहीं बचा सकते?
कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति समुद्र में डूब रहा है।
वह स्वयं को बचाने के लिए केवल यह कहे: – “मैं और अधिक प्रयास करूँगा।”
लेकिन उसे प्रयास से अधिक आवश्यकता है।
उसे एक उद्धारकर्ता की आवश्यकता है।
इसी प्रकार पाप के कारण मनुष्य परमेश्वर से अलग हो गया है।
हम अपने मानवीय प्रयासों से स्वयं को नहीं बचा सकते।
इफिसियों 2:8 कहता है:
“क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है।”
और पद 9 कहता है:
“और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।”
अच्छे काम महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन—
अच्छे काम हमारे पापों को मिटा नहीं सकते।
कल्पना कीजिए कि आपने कोई गंभीर अपराध किया और न्यायाधीश के सामने खड़े हैं।
आप न्यायाधीश से कहते हैं:
“मैंने जीवन में बहुत अच्छे काम भी किए हैं।”
लेकिन न्यायाधीश पूछेगा:
“तुमने जो अपराध किया है, उसका क्या?”
अच्छे काम अपराध को मिटा नहीं देते।
इसी प्रकार हमारे अच्छे काम हमारे पाप का दोष मिटा नहीं सकते।
हमें चाहिए—
क्षमा।
छुटकारा।
मेल–मिलाप।
और—
एक उद्धारकर्ता।
- परमेश्वर ने उद्धारकर्ता दिया — यीशु मसीह
यही सुसमाचार का केंद्र है।
परमेश्वर ने हमारे पाप की समस्या का समाधान स्वयं प्रदान किया।
यीशु मसीह संसार में आया।
उसने निष्पाप जीवन बिताया।
उसने दुःख सहा।
उसे क्रूस पर चढ़ाया गया।
वह हमारे पापों के लिए मरा।
उसे कब्र में रखा गया।
और तीसरे दिन—
वह जी उठा!
क्यों?
क्योंकि वह पापियों को बचाने के लिए आया था।
मत्ती 1:21 कहता है:
“तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वही अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा।”
यीशु का नाम ही उसके मिशन को प्रकट करता है।
यीशु बचाने के लिए आया।
- यीशु ही पिता के पास जाने का मार्ग है
यहीं पर मसीह विश्वास एक स्पष्ट दावा करता है।
यीशु ने यह नहीं कहा:- “मैं अनेक मार्गों में से केवल एक मार्ग हूँ।”
उसने कहा:- “मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।” — यूहन्ना 14:6
यह बहुत स्पष्ट कथन है।
यीशु ही मार्ग है।
यीशु ही सत्य है।
यीशु ही जीवन है।
और यीशु ने कहा:- “बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।”
प्रेरितों के काम 4:12 भी यही सत्य स्पष्ट करता है:- “और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं।”
क्यों?
क्योंकि उद्धार केवल किसी धार्मिक व्यवस्था का पालन करना नहीं है।
उद्धार परमेश्वर के साथ यीशु मसीह के द्वारा मेल–मिलाप है।
- केवल यीशु ही हमें क्यों बचा सकता है?
यीशु हमारे उद्धारकर्ता होने के लिए विशेष रूप से योग्य क्यों है?
क्योंकि यीशु केवल एक धार्मिक शिक्षक नहीं है।
नया नियम उसे— परमेश्वर के अनन्त पुत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जो मनुष्य बनकर संसार में आया।
यूहन्ना 1:1 कहता है:- “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।”
और यूहन्ना 1:14 कहता है:- “और वचन देहधारी हुआ और हमारे बीच में डेरा किया।”
यीशु स्वर्ग से हमारे संसार में आया।
वह मनुष्य बना।
उसने निष्पाप जीवन जिया।
इब्रानियों 4:15 कहता है कि वह—
“निष्पाप रहा।”
यह बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि यीशु स्वयं पापी होता, तो उसे भी उद्धारकर्ता की आवश्यकता होती।
लेकिन वह निष्पाप था।
इसलिए वह स्वयं को हमारे लिए बलिदान कर सकता था।
- यीशु ने हमारा स्थान लिया
यह क्रूस का हृदय है:
यीशु ने हमारा स्थान लिया।
यशायाह 53:5 कहता है:- “परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया।”
यशायाह 53:6 कहता है:- “यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया।”
जरा सोचिए—
हमारा पाप।
उसका बलिदान।
हमारा दोष।
उसकी धार्मिकता।
हमारी मृत्यु।
उसका जीवन।
2 कुरिन्थियों 5:21 कहता है:- “जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।”
यही सुसमाचार का अद्भुत आदान-प्रदान है।
यीशु ने वह लिया जो हमारा था, ताकि हम वह प्राप्त कर सकें जो उसका है।
- क्रूस अंत नहीं है — यीशु जी उठा
यदि यीशु कब्र में ही पड़ा रहता, तो हमारे पास सुसमाचार नहीं होता।
लेकिन— यीशु जी उठा!
मृत्यु उसे रोक नहीं सकी।
1 कुरिन्थियों 15:3–4 बताता है कि मसीह—
“हमारे पापों के लिये मरा… गाड़ा गया… और तीसरे दिन जी उठा।”
पुनरुत्थान का अर्थ है:
पाप क्षमा हो सकते हैं।
मृत्यु पर विजय मिली है।
अनन्त जीवन उपलब्ध है।
यीशु जीवित है।
हमारा उद्धारकर्ता कोई मृत धार्मिक व्यक्ति नहीं है।
यीशु मसीह जीवित है!
- उद्धार पाने के लिए मुझे क्या करना होगा?
शायद आप पूछ रहे हैं:
“यदि यीशु ने यह सब कर दिया है, तो मुझे क्या करना है?”
उत्तर बहुत सरल है:
यीशु मसीह पर विश्वास करो।
यूहन्ना 3:16 कहता है:- “जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”
प्रेरितों के काम 16:31 कहता है:-“प्रभु यीशु पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।”
लेकिन बाइबल में विश्वास का अर्थ केवल यह कहना नहीं है:
“मैं मानता हूँ कि यीशु नाम का कोई व्यक्ति था।”
विश्वास का अर्थ है—
उस पर भरोसा करना।
उसकी ओर मुड़ना।
उसे अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करना।
उसे अपना प्रभु मानना।
- पश्चाताप हमारे उत्तर का आवश्यक भाग है
यीशु लोगों को पश्चाताप के लिए बुलाता है।
मरकुस 1:15 कहता है:- “मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।”
पश्चाताप का अर्थ है— पाप से मुड़ना और परमेश्वर की ओर लौटना।
इसका अर्थ है कहना:- “हे प्रभु, मैंने पाप किया है। मैं स्वयं को बचा नहीं सकता। मुझे आपकी आवश्यकता है।”
आपको मसीह के पास आने से पहले अपने जीवन को पूरी तरह ठीक करने की आवश्यकता नहीं है।
मसीह के पास आइए और उसे अपने जीवन को बदलने दीजिए।
एक बीमार व्यक्ति स्वस्थ होने के बाद डॉक्टर के पास नहीं जाता।
वह इसलिए डॉक्टर के पास जाता है क्योंकि वह बीमार है।
इसी प्रकार—
हम यीशु के पास इसलिए आते हैं क्योंकि हम पापी हैं और हमें उद्धारकर्ता की आवश्यकता है।
- उद्धार अनुग्रह से है
आप उद्धार खरीद नहीं सकते।
आप उद्धार कमा नहीं सकते।
आप अपने कार्यों से उद्धार के योग्य नहीं बन सकते।
उद्धार परमेश्वर का अनुग्रह है।
इफिसियों 2:8 कहता है:- “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।”
अनुग्रह का अर्थ है— परमेश्वर हमें वह देता है जिसे हम कभी अपने प्रयासों से प्राप्त नहीं कर सकते।
कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति आपको ऐसा मूल्यवान उपहार देता है जिसे आप खरीद ही नहीं सकते।
आप उस उपहार की कीमत चुकाते नहीं हैं।
आप उसे—
स्वीकार करते हैं।
इसी प्रकार:
उद्धार परमेश्वर का उपहार है।
यीशु ने कीमत चुकाई।
- यीशु आज आपको बुला रहा है
हो सकता है आपने सुसमाचार कई बार सुना हो।
हो सकता है आप चर्च गए हों।
हो सकता है किसी ने आपके लिए प्रार्थना की हो।
हो सकता है आपने बाइबल पढ़ी हो।
लेकिन—
सुसमाचार सुनना और मसीह को स्वीकार करना एक ही बात नहीं है।
प्रकाशितवाक्य 3:20 में यीशु कहता है:- “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ।”
प्रश्न यह है:
क्या आप द्वार खोलेंगे?
परमेश्वर आपको मजबूर नहीं करता।
वह आपको बुलाता है।
यीशु कहता है:- “हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।” — मत्ती 11:28
ध्यान दीजिए—
“मेरे पास आओ।”
यह नहीं कहा:
“केवल धर्म के पास आओ।”
“मानवीय दर्शन के पास आओ।”
“अपनी धार्मिकता पर भरोसा करो।”
यीशु कहता है:
“मेरे पास आओ।”
- कल तक प्रतीक्षा मत करो
सबसे बड़े खतरों में से एक है यह कहना:
“मैं बाद में यीशु को स्वीकार करूँगा।”
लेकिन हम कल को नियंत्रित नहीं करते।
याकूब 4:14 हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन भाप के समान है, जो थोड़ी देर दिखाई देती है और फिर गायब हो जाती है।
आज आपके पास अवसर है।
आज आप उत्तर दे सकते हैं।
2 कुरिन्थियों 6:2 कहता है:- “देखो, अभी वह ग्रहण करने का समय है; देखो, अभी उद्धार का दिन है।”
किसी दिन नहीं।
कभी बाद में नहीं।
जब मैं बूढ़ा हो जाऊँ तब नहीं।
आज!
- आप यीशु के साथ क्या करेंगे?
अंततः प्रश्न यही है।
यह प्रश्न नहीं है:
“आप धर्म के बारे में क्या सोचते हैं?”
यह प्रश्न नहीं है:
“आप किस चर्च में जाते हैं?”
यह प्रश्न नहीं है:
“क्या आप एक अच्छे व्यक्ति हैं?”
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है:
आप यीशु मसीह के साथ क्या करेंगे?
आप उसे अस्वीकार कर सकते हैं।
आप उसे अनदेखा कर सकते हैं।
या—
आप उसे स्वीकार कर सकते हैं।
लेकिन आप यीशु के महत्व से बच नहीं सकते।
यीशु ने कहा: – “जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती; परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका।” — यूहन्ना 3:18
- व्यक्तिगत निमंत्रण
प्रिय मित्र,
हो सकता है आप परमेश्वर से दूर भागते रहे हों।
हो सकता है आपने अपना जीवन अपनी इच्छा के अनुसार जिया हो।
हो सकता है आपने ऐसे पाप किए हों जिनके कारण आपको आज भी शर्म आती हो।
हो सकता है आप सोचते हों:
“परमेश्वर मेरे जैसे व्यक्ति को कभी क्षमा नहीं कर सकता।”
लेकिन ध्यान से सुनिए:
जो व्यक्ति पश्चाताप और विश्वास के साथ मसीह के पास आता है, वह परमेश्वर के अनुग्रह की पहुँच से बाहर नहीं है।
उड़ाऊ पुत्र घर वापस आया।
पतरस गिरने के बाद पुनःस्थापित हुआ।
पौलुस, जिसने कलीसिया को सताया था, परमेश्वर की दया प्राप्त कर सका।
क्रूस पर चढ़े अपराधी ने यीशु की ओर मुड़कर आशा प्राप्त की।
और आज भी—
यीशु पापियों को बचाता है।
आपका अतीत आपके भविष्य का अंतिम निर्णय नहीं है।
आपकी असफलताएँ आपकी कहानी का अंतिम अध्याय नहीं हैं।
यीशु आपको क्षमा कर सकता है।
यीशु आपको शुद्ध कर सकता है।
यीशु आपको नया जीवन दे सकता है।
यीशु आपको अनन्त जीवन दे सकता है।
- सबसे महान निमंत्रण
यीशु ने कहा:
“जो मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूँगा।” — यूहन्ना 6:37
क्या ही अद्भुत प्रतिज्ञा है!
“जो कोई।”
इसमें आप भी शामिल हैं।
आप कह सकते हैं:
“लेकिन मैंने पाप किया है।”
यीशु के पास आइए।
“मैं असफल हो गया हूँ।”
यीशु के पास आइए।
“मैं परमेश्वर से बहुत दूर चला गया हूँ।”
यीशु के पास आइए।
“मैं योग्य नहीं हूँ।”
हममें से कोई भी अपने आप को योग्य नहीं कह सकता।
इसीलिए हमें अनुग्रह की आवश्यकता है।
यीशु के पास आइए।
- आज निर्णय लीजिए
आज आपके सामने दो दिशाएँ हैं:
मसीह से दूर
या
मसीह की ओर।
आपके जीवन में इससे अधिक महत्वपूर्ण कोई निर्णय नहीं होगा।
यीशु ने कहा:- “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा।” — यूहन्ना 11:25
और यूहन्ना 10:28 कहता है:- “और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ, और वे कभी नाश न होंगी।”
यीशु आपको—
अनन्त जीवन प्रदान करता है।
इसलिए नहीं कि आप इसके योग्य हैं।
बल्कि इसलिए कि—
वह आपसे प्रेम करता है।
अंतिम अपील — यीशु के पास आइए
प्रिय मित्र,
एक दिन कल्पना कीजिए कि आप परमेश्वर के सामने खड़े हैं।
उस दिन आपका धन आपको नहीं बचा सकता।
आपकी शिक्षा आपको नहीं बचा सकती।
आपका पद आपको नहीं बचा सकता।
आपका परिवार आपको नहीं बचा सकता।
आपके अच्छे काम आपको नहीं बचा सकते।
धर्म आपको नहीं बचा सकता।
केवल यीशु बचा सकता है।
प्रेरितों के काम 4:12 घोषणा करता है:
“और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं।”
इसलिए आज केवल यीशु की प्रशंसा मत कीजिए।
यीशु को स्वीकार कीजिए।
केवल यीशु के बारे में सुनिए मत।
यीशु पर विश्वास कीजिए।
केवल उसका नाम मत जानिए।
यीशु को अपना उद्धारकर्ता और प्रभु बनाइए।
निर्णय को टालिए मत।
आज उसके पास आइए।
उद्धार की प्रार्थना
यदि आप वास्तव में यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं और अपने जीवन को उसकी ओर मोड़ना चाहते हैं, तो अपने हृदय से यह प्रार्थना कर सकते हैं:
यीशु मसीह को स्वीकार करने की प्रार्थना
हे स्वर्गीय पिता,
मैं आपके सामने आता हूँ और स्वीकार करता हूँ कि मैं एक पापी हूँ और अपने आप को बचा नहीं सकता।
मैं अपने पापों को आपके सामने स्वीकार करता हूँ।
मुझे अपने पापों का पश्चाताप है और मैं अपने पुराने जीवन के मार्ग से मुड़ता हूँ।
मैं विश्वास करता हूँ कि यीशु मसीह परमेश्वर के पुत्र हैं।
मैं विश्वास करता हूँ कि वे मेरे पापों के लिए क्रूस पर मरे और तीसरे दिन मृतकों में से जी उठे।
हे प्रभु यीशु, मैं विश्वास करता हूँ कि आप ही मेरे एकमात्र उद्धारकर्ता हैं।
मैं केवल आप पर अपना विश्वास और भरोसा रखता हूँ।
कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे शुद्ध करें और मुझे नया हृदय और नया जीवन दें।
मैं आपको अपना उद्धारकर्ता और अपना प्रभु स्वीकार करता हूँ।
आज से मैं आपके पीछे चलना चाहता हूँ।
मेरी सहायता करें कि मैं आपके वचन को जानूँ, आपकी आज्ञाओं का पालन करूँ और अपने जीवन से आपकी महिमा करूँ।
मेरे प्रति आपके प्रेम के लिए धन्यवाद।
मेरे लिए क्रूस पर मरने के लिए धन्यवाद।
मेरे लिए जी उठने के लिए धन्यवाद।
अनन्त जीवन के वरदान के लिए धन्यवाद।
मैं अपना जीवन आपको समर्पित करता हूँ।
यीशु मसीह के सामर्थी नाम में प्रार्थना करता हूँ।
आमीन।
समापन घोषणा
यीशु केवल उद्धार के अनेक मार्गों में से एक मार्ग नहीं है।
यीशु उद्धारकर्ता है।
वही मार्ग है।
वही सत्य है।
वही जीवन है।
वही पापियों के लिए मरा।
वही कब्र से जी उठा।
वही क्षमा देता है।
वही अनन्त जीवन देता है।
और आज भी उसका निमंत्रण है:
“मेरे पास आओ।” — मत्ती 11:28
आज उद्धार का दिन है।
यीशु के पास आइए।
यीशु पर विश्वास कीजिए।
यीशु को स्वीकार कीजिए।
यीशु का अनुसरण कीजिए।
यीशु मसीह ही हमारा एकमात्र उद्धारकर्ता है।
— Ps. Ramesh C. Koundal
